बिहार वह राज्य हैं जहाँ हमलोग सिर्फ और सिर्फ अतीत में जीते हैं। अशोक, आर्यभट्ट, चाणक्य, महात्मा बुद्ध, राजेन्द्र बाबू , शेर शाह सूरी, और न जाने कितने ही इतिहास के नायक है जो अनायास ही हमारे ज़बान पर आ जाते है, जब हम अपने राज्य का बचाव करते हैं किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा की गई आलोचना से। हम याद दिलाते है उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास की, पटना विश्वविद्यालय के उन सैकड़ों आईएएस की जिन्होंने पूरे देश मे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में हम उन्हें जेपी के बिहार आंदोलन के बात बताते हैं, तो वही जब किसानों के हक़ की बात हो तो हम स्वामी सहजानंद सरस्वती के संघर्ष का अहसास कराते हैं।
इसी अतीत के बूते हम पिछले कई दशकों से अपने आप को , अपने समाज को और अपने राज्य को सांत्वना देते आये है। हम भले ही उन ऐतहासिक नायको की बात करे, मगर हकीकत में हम उनके विचारों को कबका तिलांजलि दे चुके। जाति और धर्म की राजनीति के आगे हम अपने सामाजिक और आर्थिक विकास की हमने कभी बात ही नही की। उद्योग और प्रद्योगिकी तो छोड़िये हमने शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर भी सवाल करना छोड़ दिया। अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाकर हमने सत्ता तंत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे सम्मानपूर्वक जीने के हक़ को नष्ट करने दिया।
हम पूरे देश और दुनिया में जाकर हर तरह का काम करने का माद्दा रखते हैं, unskilled से लेकर हाइली स्किल्ड लोग हम सप्लाई करते रहते है, नहीं करते हैं तो बस अपना , अपने राज्य का विकास। हमने गरीबी, भूख, पिछड़पने और जाति को ही अपनी नियति मान लिया हैं। हम TINA phenomenon में पूरी तरह यकीन करते है, क्योंकि अपनी भ्रष्ट और विकृत राजनीति बुद्धि से हमने ही इस ‘there is no alternative’ वाली साइकोलॉजी को गढ़ा है।
क्या अभी जो हम अपने राज्य के लोगो के साथ होता हुआ देख रहे है , वह हमारी आत्मा को झकझोरेगा ? क्या हमें अपनी गलती का अहसास होगा ? क्या हम दूसरे राज्य के लोगों के मज़ाक का पात्र बनना बंद होंगे ? ऐसे बहुत से सवाल हैं, मगर बदलाव की उम्मीद बेहद कम।
(2020 में कोरोना बंदी के समय लिखा गया।)


