Geopolitics – Ukraine Conflict

In the coming weeks Russia is set to hold referendum in the four oblasts of Donetsk, Luhanshk, Kherson and Zaporizhia. This is going to be a huge turning point in this conflict.
With these four provinces and the earlier occupied Crimea officially declared as part of Russia, possibility of any negotiated settlement would come to an end.
Further, any Ukrainian attacks on these territories would amount to attack of “Russian Soil”. This gives Russia opportunity to declare full scale “war” which till now it officially calls “special military operation”.
In order to defend these territories and the possibility of further esclation, mobilisation of three lakh troops has been ordered.
The West will obviously be furious over this decision, will impose further sanctions and provide Ukraine with more sophisticated weapons. So, tough times are ahead this winter for the world at large and Europe in particular.

राजनीति – कांग्रेस

आज के कांग्रेस में मोटे तौर पर दो विपरीत विचार वाले लोग है। एक वो जो चाहते है की पार्टी आने वाले चुनावों पर पूरा फोकस करे और वही जोर लगाए, चाहे वो राज्य के चुनाव हो या लोकसभा के। वहीं दूसरी ओर राहुल का कैंप है को लंबी लड़ाई लड़ना चाहता है,जिसका मुख्य आधार सत्ता पाना ना होकर विचारधारा है।
पहले विचार वाले लोग बेसिकली प्रोफेशनल पॉलिटिशियन है, जो मानते है की राजनीति धरम करम की चीज नहीं बल्कि सत्ता की लड़ाई है। वे लंबे समय से कांग्रेस को establishment के रुप में देखते आए है और उन्हें विपक्ष में ज्यादा समय बैठने का अनुभव नहीं है। उन्हें लगता है और बहुत हद तक ये सत्य भी है की सत्ता में बाहर रहने से पार्टी में डिफेक्शंस बढ़ रहे है। साथ ही उन्हें यह भी महसूस होता है की विचारधारा को बचाने के लिए सत्ता का संरक्षण जरूरी है। शायद वे लेफ्ट का हाल देखकर समझ रहे है, की सिर्फ विचारधारा की पीपुडी बजाने से कुछ नही होता।
दूसरे विचार वाले लोग राहुल और बाई डिफॉल्ट कांग्रेस पार्टी को हार्ड लेफ्ट की तरफ ले जा रहे है। आइसा और एसएफआई के कॉमरेड लोग का राहुल -प्रियंका के आस पास जमावड़ा हो गया है। राहुल सीताराम येचुरी को अपना राजनीतिक गुरु बना लिए है और सीपीएम की राह पर चलकर अब विचारधारा विचारधारा खेलने के मूड में है।
देशभर की यात्रा करना बेशक एक अच्छा कदम है, बापू ने भी यही किया था गोखले के सुझाव पर। मगर क्या सामने खड़े चुनावी राज्यों को दरकिनार कर पूरी ताकत यात्रा पर लगा देना सही कदम है ? यह यात्रा न तो गुजरात से होकर गुजर रही है और न ही हिमाचल से। क्या राहुल अपने लॉन्ग टर्म विजन के लिए पार्टी को इन राज्यों में कुर्बान करने के लिए भी तैयार है ?
केजरीवाल की आप पूरी ताकत के साथ गुजरात के रण में उतर चुकी है और कांग्रेस पूरी तरह उसे वॉकओवर देती हुई दिखाई पड़ती है। ये तो हम जानते ही है की किसी राज्य में तीसरी ताकत आने के बाद कांग्रेस वहा से लगभग वहा खत्म सी हो जाती है। गोवा का हाल हम देख ही रहे है जहां थोक के भाव में विधायक बीजेपी में जा रहे है। यही हाल कमोबेश पंजाब और जम्मू कश्मीर का भी है। कांग्रेस के भावी अध्यक्ष अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की कुर्सी पायलट को देने को तैयार नही ही है, तो पता नही कब राजस्थान की सरकार भी गिर जाए।

इस सारी परिस्थिति में क्या “भारत जोड़ो” की जगह “कांग्रेस बचाओ” मौजू नही रहता क्या ?

Personality – Queen Elizabeth

The grace with which Queen Elizabeth preserved the institution of monarchy in a century of rapid changes was a remarkable one. At the same time she helped in deepening of British democracy with her impartial stance on key issues of her times. One never got to know her opinions even on contentious issues like Brexit and the decline of Empire. Such neutrality is defenitely not easy to maintain.
The monarchy which across Europe in first half of 20th century was associated with recklessness, violence and mass murders with the likes of Leopold’s, Tsar’s and Kaiser’s dominating the scene was given a humane chracter by the Queen, and because of her not just the British public but the whole globe accepted the British exceptionalismwith regard toonarchy.
There were family intrigues at times, but which family dosent have them ? Still Queen herself was never in the eye of storm.
There’s an uphill task in front of King Charles III to fit in the shoes of her mother. With all the controversies surrounding his love affairs and previous scandals he is obviously not that popular. He also has the baggage of history with him as the reigns of Charles I and II were not not that good. While Charles I saw a civil war and was eventually hanged, Chrles II had to flee Britain during the Commonwealth interregnum following his father’s assassination.

राजनीति – तीसरा मोर्चा

यूं तो तीसरे मोर्चे के बारे में प्रसिद्ध है की ये पांच साल से ज्यादा एक दूसरे से दूर नही रह सकते और दो साल से ज्यादा एक दूसरे के साथ नही रह सकते। मगर फिर भी हर लोकसभा चुनाव से पहले यह कयावद की ही जाती है। परंपरा भी आखिर कोई चीज होती है !!
तीसरे मोर्चे के संभावित दलों को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है : पहला, कांग्रेस से निकले हुए दल जैसे टीएमसी, एनसीपी, वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस आदि और दूसरा, समाजवाद के टूटे हुए दिल जो इधर उधर गिरे पड़े है जैसे जेडीयू, आरजेडी, सपा, आईएनएलडी, बीजेडी आदि।
कन्वेंशनल विचारधारा के हिसाब से यह भानुमती का कुनबा (तीसरा मोर्चा) हमेशा की तरह ही सफल नहीं हो सकता। विपक्ष में यह विचार बीजेपी या कांग्रेस को कोर में रखता है। इसके बिना कोई भी गठबंधन ज्यादा दिन नहीं टिक सकता।
हालांकि, इस समय की स्थिति काफी भिन्न है। कांग्रेस कभी भी इतनी कमज़ोर नही रही है जितनी की वह आज है। ख़राब से ख़राब प्रदर्शन पर भी कांग्रेस के 130 से अधिक ही सीट रहा करती थी।अब हाल यह है की वह 50 भी बमुश्किल पार कर पा रही है। इसलिए कांग्रेस अब राजीव गांधी या चचा केसरी की तरह समर्थन देकर वापस लेने की परिस्थिति में नहीं है।

फिर भी जो भी नेता प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखे उसके पास ठीक ठाक संख्या में सांसद तो होने ही चाहिए। कांग्रेस से बहुत ज्यादा नहीं तो बहुत कम भी नहीं। फिलहाल कोई भी क्षेत्रीय दल इस स्तिथि में नही है।
पुराने समाजवादियों में ज्यादातर नेता या तो राजनीति से रिटायर हो गए है या फिर होने वाले है, जैसे की लालू, मुलायम, चौटाला, देवगौड़ा। सिर्फ नीतीश कुमार ही बचे है जो अभी भी एक्टिव पॉलिटिक्स में है और मोदीजी की कुर्सी हथियाने के ठीक ठाक मंसूबे भी पाले है। जनता परिवार फिर अगर एक हो जाए (जिसकी कोशिश छह साल पहले भी की गई थी),तो इसकी ताकत में ठीक ठाक इज़ाफा हो जाता है। नीतीश नेशनल फेस होने के साथ ही तेजस्वी, अखिलेश, जयंत आदि के गार्डियन के रूप में भी काम कर सकते है। और फिर ना तेजस्वी यूपी जाने वाले है और न ही अखिलेश बिहार।
रही बात कांग्रेस से टूटे दलों की तो उनका विलय होना तो असंभव लगता है।
खैर राजनीति असीमित संभावनाओं का खेल है, जहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। याद रहे, निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा भी मुख्यमंत्री रह चुके है।

Subjective vs Objective Entrance Test

The academic debate between subjective and objective (MCQ) based entrance test has been a long one. However, in light of controversy surrounding CUET PG entrance test it has yet again come to the surface.
This debate should however be understood in perspective. Basically even more than the pattern of entrance tests, it’s about autonomy of universities/institutions to decide upon their admission process.
Premier institutions/universities have for the past decade struggled to keep aflot their time tested qualitative subjective test against the onslaught of homogenisation of entrance tests by successive governments. They fear dilution in the quality of students.
At the same time it needs to kept in mind the challenge a student has to face when s/he has to apply for multiple entrance tests. Besides putting in a lot of money as fees there are also fear of exams getting clashed. Further, same set of students get top ranks in tests of various universities/institutions. Obviously they take admission in one place only but the whole process leads to increase in councelling sessions leading to delay in academic year. This also leads to seats greeting vacant as students withdraw later.
The experiments of JEE and NEET have substantially reduced the financial burden on students. Moreover, they can focus better on one exam instead of hopping between different exam patterns of erstwhile IIT-JEE, AIEEE, state PETs and private engg college tests.
A centralised exam is at anytime better for both adminstrative and financial reasons. However, the lopside is that you can’t check the writing skills and creativity of the student in this simply because a million or two students can’t be checked in a subjective test.

People’s Revolution – Srilanka

श्रीलंका में जो इस वक्त हो रहा है वह कई मायनों में एतिहासिक है। फ्रांस की क्रांति से लेकर हाल के समय में होने वाली अलग अलग मुल्कों में क्रांति ने अक्सर ही हिंसक रूप धारण किया हैं। अरब जगत, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के देशों में सत्ता के लिए हिंसक संघर्ष बहुत ही आम सी बात हो गई है।
मगर यहां श्रीलंका में अब तक तो कोई बड़े स्तर की हिंसा नहीं हुई है सिवाय प्रधानमंत्री के घर को आग लगाने के। महीनो से आर्थिक बदहाली में जीते लोगो ने गजब का संयम दिखाया है। जहां लोगों को खान पान, पेट्रोल डीजल, सैलरी आदि भी उपलब्ध न हो वहा के लोगों के दर्द की इंतेहा को समझा जा सकता है। इन सबके बावजूद वहां किसी ने प्रकट रूप से बंदूक नही उठाई है। शायद वे नही चाहते अपने देश को वापस दस साल पुराने गृहयुद्ध में धकेलना। पुलिस और सेना ने भी अभी तक संयम दिखाया है और जनता से संजीदे तरीके से पेश आई है।
श्रीलंका की जनता परेशान है तो अपने भ्रष्ट और स्वार्थी राजनितिक तंत्र से। चाहे राजपक्षे हो या विक्रमसिसिंघे, उन्हे किसी पर एतबार नही है। वे मौजूदा सत्ता को तो बिलकुल ही नही चाहते। वे नही चाहते की जिन लोगो ने उन्हे इस हाल में पहुंचाया वहीं आईएमएफ से बात करने जाए। शायद वे अब आर्थिक समझदारी को बहुसंख्यवाद पर अब तरजीह देना चाहते है।
जिस तरह से मौजूदा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कुर्सी का खेल खेल रहे है उससे एक निराशा का भाव उत्पन्न होना लाजमी है। ऐसे प्रतीत होता है की राजपक्षे परिवार अभी भी परोक्ष रूप से सत्ता पर पकड़ रखना चाहता है। इस समय सही मायने में एक नेशनल यूनिटी सरकार की जरूरत है, जो आईएमएफ और विश्व के अन्य मुल्कों से बात करके रास्ता निकल सके।
अगर श्रीलंका का राजनैतिक वर्ग यह सही रास्ता नहीं पकड़ पाया तो बहुत संभव हो की सेना को मजबूरी में ही सही सत्ता अपने हाथ में लेनी पड़ेगी। सेना का सत्ता में आना एक बहुत ही खतरनाक विकल्प है, क्योंकि इक बार सत्ता का स्वाद चखने के बाद सेना को इसकी आदत हो जाता है। उपमहाद्वीप में पाकिस्तान और म्यांमार के उदाहरण हमारे सामने है।
भारत के अलावा श्रीलंका ही उपमहाद्वीप में एकमात्र देश है जिसमे आजादी से आज तक लोकतंत्र टिका हुआ है। यहां तक की 26 वर्षों के गृहयुद्ध में भी श्रीलंका सेना ने तख्तापलट नहीं किया। अगर ऐसी नौबत आती है तो निसंदेह यह पूरे क्षेत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

हाल- ए -मीडिया

वैसे तो हाल के समय में पूरा मीडिया जगत ही पतन की ओर अग्रसर है, ज्यादातर न्यूज चैनल एवम अखबार या तो गोदी मीडिया की श्रेणी में आ चुके है या फिर आने वाले है।
मगर इसमें भी खासकर हिंदी मीडिया का हाल और ज्यादा बुरा है। एक इंटरेस्टिंग बात यह है की एक ही मीडिया नेटवर्क में शामिल हिंदी चैनल जहां भक्त की कैटेगरी में आता है वहीं दूसरी ओर उसी नेटवर्क का इंग्लिश चैनल/अखबार अभी भी काफी हद तक लिबरल है।
उदाहरण के लिए जी समूह के तहत “जी न्यूज़” जहां पहली कैटेगरी में आता है, वही उसी समूह का अंग्रेजी चैनल “WION” दक्षिणपंथी झुकाव रखते हुए भी फैक्ट बेस्ड रिर्पोटिंग करता है। यही हाल आनंद बाजार समूह का भी है, जहां “एबीपी न्यूज़” हिंदी में कचड़ा परोसता है वही उसी समूह का अंग्रेजी अखबार “द टेलीग्राफ” अपने उदारवादी और कुछ हद तक वामपंथी विचारों के लिए जाना जाता है। एक्सप्रेस समूह में भी कमोबेश यही हाल है, जहां अंग्रेजी अखबार “द इंडियन एक्सप्रेस” दिन प्रति दिन पत्रकारिता की नई इबारते लिख रहा है, वही उसका हिंदी अखबार “जनसत्ता” लगातार रसातल में जा रहा है। यहां तक कि सबसे प्रसिद्ध इंडिया टुडे ग्रुप की बात करे तो वहा भी “आज तक” भक्ति में कोई कसर नहीं छोड़ता वही अंग्रेजी चैनल “इंडिया टुडे” अभी भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं।

Geopolitics : कैनेडी-ख्रुसचेव

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यह अनकहा नियम है कि कितनी भी शत्रुता होने के बाद ही बातचीत के दरवाज़े बंद नही करने चाहिए। और बातचीत जारी रखने की पहले शर्त यह है कि आप दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान करें। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से बाइडेन और पुतिन अपनी आपसी दुश्मनी में इस हद तक चले गए है की वे सरेआम एकदूसरे को “हत्यारा” कहते है और तख्तापलट करने की बात करते है।
इस वक़्त दोनो पक्षो को जरूरत है कैनेडी और ख्रुसचेव जैसे पूर्ववर्तियों से सीखने की। 1962 में भी दुनिया इसी तरह तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी, और अव्वल तो दोनों देशों की जनता भी एक दूसरे को सबक सिखाना चाहती थी। उस वक़्त दोनो स्टेट्समैन ने एक दूसरे का सम्मान करते हुए रास्ता निकाला। परिणामस्वरूप सोवियत रूस को क्यूबा से और अमेरिका को तुर्की से अपने परमाणु बम हटाने पड़े।
जाहिर तौर पर दोनों ही नेताओ की अपने घर में आलोचना हुई, जहाँ एक साल बाद कैनेडी की हत्या कर दी गयी वही दो वर्ष बाद ख्रुसचेव को भी सत्ता से बेदखल कर दिया गया। ऐसा नही है कि दोनों नेताओं को अपने साथ होने वाले व्यवहार का इल्म नही होगा, लेकिन एक सच्चे स्टेट्समैन की तरह दोनो ने आपसी रंजिश को युद्ध के से हल करने के बजाए बातचीत कर शांति का रास्ता खोजा।

Personality – सुशांत सिंह राजपूत

बहुत कम ही मौतें ऐसी होती हैं जो समाज को इस कदर झकझोर जाती हैं। यूँ तो लोग हर किसी को दो दिन में भुला दिया करते हैं। मगर तुममे कुछ खास हो, भुलाये नहीं भूलते। तुम्हारा वो मासूम चेहरा, तुम्हारे संघर्ष की दास्तां, तुम्हारा अपने गृह राज्य से लगाव, तुम्हारी समाज के प्रति संवेदनशीलता, तुम्हारी क्वांटम फिजिक्स की समझ, जैसे न जानें कितने ही कहानियां हैं, जिनमें तुम याद किये जा रहे हो।
तुम उस इंडियन ड्रीम के रिप्रेजेन्टेटिव हो, जिसका सपना हर गाँव-देहात औऱ छोटे शहर के लड़के-लड़कियां देखा करते हैं। तुम्हारे आकस्मिक चले जाने से इन सब के अंदर कुछ टूट सा गया हैं। तुम्हारे जीवन की कहानी हम सब के जीवन का मैक्रो कॉज़म हैं, जिसमें हम सब अपना अक्स ढूंढते हैं।
चाहें मेन्टल हेल्थ का सवाल हो या नेपोटिज़्म, हम सब तुम्हारे संघर्ष से अपने आप को रिलेट कर सकते हैं। चाहें हम एडमिट करें या ना करें पर हकीक़त तो यहीं हैं कि हम सबने इन चीज़ों को जीवन के किसी न किसी रूप में सामना किया होता हैं। दीज़ थिंग्स आर सिस्टेमिक टू आवर लाइव। ये सामूहिक गुस्सा हमारे कलेक्टिव कांशसनेस का एक्सप्रेशन हैं, जो तुम्हारी मौत के साथ फ़ूट पड़ा हैं।
तुम भले ही इस दुनिया से रुखसत हो गए हों, मगर छोड़ गए हो तो बहुत से सवाल; जिनका जवाब न केवल बेहद जटिल हैं पर बेहद कष्टदायक भी हैं।

राजनीति – बिहार

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 पूरी तरह से नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने पर केंद्रित था। विरोधी राजद, सहयोगी भाजपा तथा मोदी के हनुमान, चिराग कोई भी नीतीश को मुख्यमंत्री नहीं देखना चाहता था। साथ ही जनता में भी एक भारी गुस्सा उबल रहा था कुर्सी कुमार के प्रति। वो बात अलग है की सबसे कम सीटों के बावजूद कुर्सी कुमार मजबूरी के मुख्यमंत्री बने बैठे है।
बहरहाल एक बात तो स्पष्ट है की यह विधनसभा 1974 बैच के लिए आखरी है। जेडीयू में कोई दूसरी पीढ़ी नहीं दिखती, जो चचा नीतीश की जगह ले सके। राजद, तेजस्वी की तमाम कोशिशों के बावजूद माय कॉम्बिनेशन से आगे नहीं जा सकी है और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी एक अदद चेहरा न दे सकी।
इस स्तिथि में प्रशांत किशोर जैसा तेज दिमाग वाला प्राणी अगर बिहार की मरी हुई राजनीति में जान फूंकने के कोशिश करता है तो इसका स्वागत होना चाहिए।